शिक्षा के साथ सतत् विकास व स्वांलबन से जुड़ा है नारी का सशाक्तिकरण

डाॅ. प्रकाशिनी तिवारी

Abstract


सारांश:- हमने आजादी के 71 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं लेकिन इन बीते वर्षो में महिलाओं की साक्षरता की दर मे भले ही वृद्धि हो गई हो उन्हें आर्थिक स्वालंबन भी प्राप्त हो गया हो लेकिन समाज उनको दोयम दर्जे का स्थान दिखाए बिना संतुष्ट नहीं है। क्या कोई समाज जहां पुरूष एवं महिला मे भेदभाव करे तो वह प्रगति कर सकता है? कदापि नहीं। हमारे भारतीय संविधान में उल्लेखित है कि देश में जाति, धर्म, लिंग, सम्प्रदाय आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा, किन्तु क्या इसका पालन हो रहा है! नहीं ऐसा नहीं होता है। यही एक सच्ची हकीकत है इसलिए महिलाओं की शिक्षा ही महिला सशक्तिकरण की आधार स्तम्भ बना कर उनको आर्थिक मजबूती व स्वतंत्रता प्रदान की जानी चाहिए। शिक्षा ही महिला एवं समाज के समग्र विकास तथा सशक्तिकरण के लिए आधारभूत आवश्यकता है साथ ही यह एक मौलिक अधिकार भी होना चाहिए। इससे एक संगठित व गुणवत्तायुक्त समाज का विकास होता है। महिलाओं को उनके जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय के साथ कार्य क्षेत्र से संबंधित निर्णय लेने का अधिकार होना, व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं कानूनी सभी क्षेत्रों में समान अधिकार प्रदान करना। महिला सशक्तिकरण वर्तमान समय का बहुचर्चित मुद्दा है और महिलाएं भी अपनी पूरी क्षमता को सकारात्मक ऊर्जा के साथ पूरी तरह से इस दिशा में लगाने के लिए इसी दिशा में अग्रसर हो रही है। घर के अंदर या बाहर सभी जगहों पर महिलाएँ अपना एक स्वतंत्र दृष्टिकोण रखकर अपनी शिक्षा, व्यवसाय, जीवन शैली से संबंधित सभी निर्णय को स्वयं लेते हुए अपने जीवन तेजी से अपना नियंत्रण कायम करने में कामयाब हो रही है। आज आधुनिक शिक्षा, टेक्नोलाॅजी से आए बदलाव के कारण महिलाओं का उत्कर्ष चरम पर है। इसी के चलते हमारे देश में महिलाओं की स्थिति में बहुत ही सुधार हो रहे हैं। महिला शिक्षा के उत्कर्ष के चलते हमारे देश में सारी दुनिया के मुकाबले सबसे अधिक प्रोफेशनल तौर पर सक्षम महिलाएं हैं। कामकाजी महिलाओं की संख्या में निरंतर वृद्धि होने से महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता मिली है जिससे वे अपने जीवन का नेतृत्व स्वयं करने के साथ-साथ आत्म विश्वास के साथ विविध व्यवसायों को अपनाकर प्रमाणित करने का प्रयास कर रही है कि वो किसी भी मामले में पुरूषों से पीछे नहीं हैं। महिला सशक्तिकरण शहरी कार्यरत् महिलाओं तक सीमित नहीं रहा है वरन् दूर के कस्बों एवं गांवों में भी महिलाएं भी अपनी आवाज को सशक्त कर रही है सही मायनों में महिला सशक्तिकरण तभी हो सकता है जब समाज की सोच महिलाओं के प्रति परिवर्तित हो। उनका उचित सम्मान, निष्पक्षता तथा समानता का व्यवहार किया जाए। क्योंकि उचित और पर्याप्त शिक्षा के बिना महिलाओं को सशक्त व्यक्तियों में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। उन्हें निरंतर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जिससे वे एक ज्ञानवान समाज के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकें।  

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References


महिला सशक्तिकरण दशा और दिशा - योगेन्द्र शर्मा

समाज कार्य एवं महिला सशक्तिकरण - रोहित मिश्रा

महिला सशक्तिकरण एवं मानवाधिकार - डाॅ. सौरभ गुर्जर

महिला सशक्तिकरण और नारीवाद - पी.डी.शर्मा

महिला सशक्तिकरण (नीति, कानून एवं योजनाएं) - डाॅ. सौरभ गुर्जर

महिला सशक्तिकरण एवं राष्ट्रीय महिला आयोग - डाॅ नीलम

महिला सशक्तिकरण और मानवाधिकार - डाॅ. कमल यादव

समाज कल्याण पत्रिका


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